रविवार, 14 अक्टूबर 2012

पतझड़


आज कल ढेरन देशो में पत्ते रंग बदल रहे हैं , खबसूरत होते हैं | विभिन्न प्रकार के रंग , लाल, पीला, गुलाबी| इन्हें देख कर हरा रंग याद आता है , वसंत याद आता है , और याद आती है ऋतु पतझड़ की | दीये का फड़फड़ना बुझने से पहले; खूबसूरत कैसे हो सकता है , क्या मौत भी कभी खूबसूरत होती है , शायद होती होगी तभी तो लाखो सैलानी देखने आते हैं| 

विज्ञान का छात्र रहा हूं वो कहता है , रंग असल में होता ही नही , सारे रंग आँखों में होते है; दर्शन भी तो यही कहता है Beauty lies in the Eyes of the beholder”. रंग रौशनी के विभिन्य तरंगदैर्ध्य की तरह एक छलावा ही तो है , जैसे गिरगिट देता है सबको | हर पशु हर रंग को अलग देखता है और वही समझता है जो उसे दिखता है , यह हर चीज कों अपने दृष्टिकोण से देखना सिर्फ रंगों तक ही सीमित नही है| यह मानसिकता कही आगे तक जाती है| हमारे दिनचर्या के हरेक व्यवहार में| तो क्या यह छलावा काफी नही हैं, फिर यह बाहरी दिखावा और कृत्रिम रंग, आंतरिक खुशी क्यों और कैसे दे जाते हैं|

जिंदगी भी तो १ साल की तरह ही है , इसका भी पतझड़ आना ही है , कुछ पत्ते लाल पीले हो पतझड़ में गिरते हैं वही कुछ जेठ के दुपहरी नही सह पते , कुछ सावन भादो की बारिश में गिर जाते हैं | 

हमारे देश में यह देखने को कम ही मिलता है| यहाँ के पत्ते भी भ्रष्टाचार की तरह सदाबहार होते हैं| कुछ जो गिरते हैं, रंग बदलते हैं उन्हें या तो हम देख नही पाए या देख के अनदेखा कर देते हैं,  खूबसूरत जो नही लगते !

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

मैडम और दामाद जी

मैडम : १० जनपथ के कुत्ते भी कम से कम १००० करोड़ का घोटाला करते हैं , और रॉबर्ट तुम दामाद होके ३०० करोड़ में पकडे गए
रॉबर्ट : अरे सासु माँ आपको तों पता है मैंने तों १० लाख करोड़ का घोटाला किया है आपको स्विस बैंक अकाउंट नंबर दिया तो था
मैडम: लेकिन पकडे तों ३०० करोड़ में ही गये हो
रॉबर्ट : अरे सासु माँ , ससुर जी भी तों ६५ करोड़ में गए थे
मैडम: अरे वो जमाना और था तब तक सबसे बड़ा

पकड़ा गया घोटाला था , बेटी मैंने बोला था इस तांबा चिंदी व्यापारी से शादी करोगी तों बदनामी करायेगें , २ जी और सी डबलू जी के बाद दामाद जी सिर्फ ३०० करोड़, इससे ज्यादा तो शाहरुख ने नकली रॉबर्ट बन के रावन में कमा लिया ..नाक कटा दी तुमने रॉबर्ट ....राहुल इस रॉबर्ट को लिक्विड ओक्सीजेन में डाल दो , वैसे भी वारिस तो इस कलमुहे ने दे ही दिया है |
राहुल: माँ मेरा भी तो वारिस होगा
मैडम : रहने दो बेटा तुमसे न होगा , जाओ जाके DDLJ देखो , इटालियन सब टाइटल के साथ

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

उलटे पांव वाली चुड़ैल

मैं एक ऐसी पीढ़ी से हूं , जिसने समय को बड़े तेजी से बदलते देखा है| आज हम कंप्यूटर पे काम करते हैं , बचपन से ही | बच्चो के होम वर्क मोबाइल पर आता है , नही बनाया तो गए बेटा बाप दोनों  | एक हमारा समय था (ज्यादा नही सिर्फ १५ साल पहले ) जिसने होम वर्क बनाया उसे मैं ऐसे देखता था की ये इस विद्यालय में क्यों आया , सब कुछ आता ही है तो सीधा कॉलेज चला जाये तथागत या वशिष्ट नारायण जी के तरह | आज कल , बच्चों से बचपन ही छीन जाता है , बेचारे नाना नानी दादा दादी से कहानियां भी नही सुन पाते| आज के Nuclear Family में बुजुर्गो के लिए जगह साल के १०-१५ दिन ही है, ३६५ दिनों के लिए कोई जगह नही बची| बच्चे के लिए गुलजार की  पोटली बाबा की  जगह Harry Potter , सीन चीन , बेन१० ने ले लिया है|

बचपन में बहुत कहानी सुनी थी, नाना प्रकार की कहानियां | आज कल Crossword और Landmark स्टोर तथा  amazon.com और  flipkart.com में मिलने वाली कहानियों की किताब से संस्कृति को आगे के पीढ़ी में ले जाना कितना सार्थक हो रहा है ये तो आने वाली पीढ़ी ही बताएगी |  हमारे समय में कुछ महानगरी बच्चों को Archies और टिनटिन का साथ था , वही चाचा चौधरी , सुपर कमांडो ध्रुव, नागराज और चंपक जैसी कहानियां  छोटे शहर वाले बच्चो में कौतुहल पैदा करती थी , वही देहातों में नाना नानी टाइप  कहानियों से काम चलता था | अजी काम क्या चलता था यूँ कहिये इनके सामने J K Rowling भी  फेल थीं | बात भाषा की नही थी , बात थी उस साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग की जिसने भारत कों २ सदियो एक स्वतंत्र अर्थ व्यवस्था के बजाए कच्चे माल का श्रोत मात्र बना के रखा था | खैर वो अपने आप में एक अलग मुद्दा है , इस बचपन के मासूम विषय से इतने भारी भरकम समस्या कों अलग ही रखते हैं |

राजा रानी की कहानियां भी थी , राजकुमारी की कहानियां भी थी, कुछ कहानियां मन को बहलाने वाली होती थी , कुछ मन को झंझोरने वाली , कुछ जिंदगी के पाठ सिखाने वाली , तो कुछ बस यूँ ही कह देने वाली | समाज में कुछ ऐसी कहानियां सुनाने वाले भी थे| कुछ इन्ही कहानियां में से एक उलटे पांव वाली चुड़ैल के कहानी थी| कहानी बड़ी दिलचश्प भी हुआ करती थी और डरावनी भी | मरने से पहले  चाहे कितनी भी बदसूरत रही हो चुड़ैल बन के बड़ी खूबसूरत होती थी | शायद ये कल्पना ही थी पुरुष प्रधान समाज के उन बदकिस्मतो की ... और उन लोगो की भी जो अपनी बदसूरती ढांकने के लिए दूसरों कों चुड़ैल साबित करने में लगे रहते/रहती हैं | कहानियां आखिर आइना तो समाज का ही होती हैं | ऐसी कहानियां बड़ा रोमांच पैदा करती थी , छोटे से दिमाग का एक हिस्सा खुद कों व्योमकेश बक्शी (बड़े शहर वाले व्योमकेश की जगह Sherlock holmes पढ़ ले ) का अवतार समझ इन कहानियों की सच्चाई पता लगाने के लिए उकसाता था , वही एक बड़ा हिस्सा जो भारतीयों वोटरों के तरह ही था, बोलता था जाने दो जो जैसा है वैसे रहने दो शायद इनमें ही कोई सच्चाई हो |  दिमाग के किसी एक subconscious हिस्से में ये कहानियाँ घर कर गयी थी |

कभी ये समझ नही पाया ये चुडैलों के पैर दाये बाए उल्टा होता है या आगे पीछे , ऐसा नही था की मुझमे जानने की इच्छा नही थी , ये सवाल मैं कई बार मेरे दिमाग में आया था , कुछेक बार तो मैं पूछ भी लिया था , लेकिन चुड़ैल देख चुकने का दावा करने वाले लोगो में भी मतभेद था | खैर ९वी में जीव विज्ञान में जब classification of kingdom के बारे में पढ़ा तो समझा, हो सकता है चुड़ैल प्रजाति की भी दो स्पेसिएस होते होंगे |

इस बात का पर्दाफाश तब हुआ जब एक बार सुबह सुबह ३ बजे मेरा हैदराबाद जाना हुआ | अगर आपका भुत ज्ञान ठीक ठाक है या फिर आपने Haunted movie देखा है तो आप समझ गए होंगे ३ बजे भूतो की ताकत सबसे ज्यादा होती है| सुनसान एयर पोर्ट नाम भी ऐसा  , खुद ही असामयिक बम से मरे हैं चुड़ैल नही तो भुत तो बन के इधर ही होंगे | मेरी सिट्टी पिट्टी गुम , आगे देखा तो कई सारे पाँव के निशाँ सारे दाये बाये टाइप , उलटे होते तो समझा लेता कोई गया नही आया होगा ....सारे निशान औरतों के  थे , मैंने सोचा बेटा आज तो मौका मिल गया , अंदर के व्योमकेश की आत्मा मरे जा रही थी , दिल का धड़कने बढ़ गयी थी , दिल का दौरा तो पड़ने ही वाला था |

तभी किसी ने बोला वो देखो , आज हैदराबाद में फैशन शो है , सारी टॉप मॉडल कैट वाक करके जा रही है, पैर तों उलटे ही होंगे | मैंने सोच कैट वाक का नाम बदल देना चाहिए| दिल का दौरा तो शायद अभी पड़ने वाला था पर जान बच गयी थी | व्योमकेश फिर से जी उठा था | इन कहानियो का राज ऐसी ही लड़के लड़किया होंगी जो प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मॉडल न बन पायी थी और सुनसान रातों में कैट वाक करती होंगी | एकाएक भुत और चुड़ैल से दिखने वाले अंग्रेज भारत कों भूतो और चुड़ैलो से निजात दिलाने वाले मसीहा लगने लगे थे |

जब ये चीजे काल्पनिक साबित हो गयी , फिर ऐसे कुछ चुड़ैले सुपर कमांडो ध्रुव और नागराज से दुश्मनी करने लगे , ज़माना बदला तो कुछ असल जीवन वाली चुड़ैलें राजनीती में आ गयी, मैं गलत था शायद मैंने हाथ या हाथी के खूबसूरती ही देखा था उनके पीछे के चुड़ैलों के इरादे की बदसूरती को नही  |

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

एक बिहारी की व्यथा


 “Cow is four footed domestic animal. It also has a mouth, two eyes, a nose, two horn and a long and narrow tail. Cows are found in almost all parts of the world. Cows are found in many colours, such as white, black and red, some are of mixed colours. In India We worship cow as goddess and mother.”

बचपन में परीक्षा मे अंग्रेजी में काउ पर लेख लिखने को आता था , मैं तो ऐसा ही कुछ लिखता था जो याद कर लिया था किसी और जानवर पर आ जाये तो भी इसी में कुछ जोड़ घटाव कर के बना कर लिख दो | ये ज्ञान तो रटन्त ही था, समझना तो परे था, लगता था, गाय गाय होता है दूध दूध होता है , मास्टर साहब काउ और मिल्क कह देने से कुछ अंतर पड़ जायेगा का, लेकिन नही जनाब बात हाई सोसाइटी का था गाय बोल दिया तो गाय ही समझा और शून्य दिया| वही  ५ लाइन रट के लेख लिखने वाला विद्वान | शायद शिक्षा प्रणाली का ही दोष है|

खैर नही समझा, मैं हर साल मैं अंग्रेजी में अनुतीर्ण होता गया और अंग्रेजो भारत छोडो आंदोलन पर भरोसा और पुख्ता होता गया| अंग्रेजी के हर लेक्चर मे वीर कुंवर की तलवार उठाने की ललक जागती थी , लेकिन अंग्रेज चले गए थे , हम में कुंवर सा न जज्बा था न हिम्मत , समानता थी दो. एक हम दोनो एक ही जिले मे पैदा हुए थे और दूसरी जितनी नफ़रत उन्हें अंग्रेजो से थी उतनी मुझे अंग्रेजी से |

फिर कही से स्वघोषित गुदरी के लाल का चरवाहा विद्यालय बैठ गया , फिर उन्होंने ने सारे बिहार को के बच्चों कों अंग्रेजी से निजात दिला दिया , अंग्रेजी क्लास १० की परीक्षा से हटा ली गयी थी , मालूम पड़ चुका था मुझे १० पास होने के लिए कायनात की ही साजिश है, लालू के रूप में खुद भगवान ही थे | अब मैं Non Matric के tag के साथ नही मरूंगा| Malcom gladwell का outlier फिर से याद आ गया था| वो नही लिखते तो मैं ही लिख देता था , लेकिन बात outliers की थी बहिर्वासी(outliers) की नही | बहुत बाद में मालूम पड़ा ये चरवाहा विद्यालय भैंस पर बैठ कर भैंस का चारा खाने के लिए ही बनाया गया था |

खैर अंग्रेजी में काउ पे लिखा यह लेख और इसकी बिना आवाज के मनोबल तोड़ने वाली लाठी, जाने कितने उत्तर भारतीयों को हिंदी माध्यम में आई ए एस बना चुका है | के पी ठाकुर साहब ही किताब थी बहुत बिकती थी आज भी बिकती है , जो हमें ये तो सिखाती थी  की “घोडा सड़क पर अडक कर भड़क गया” का अंग्रेजी क्या होता है लेकिन सहज अंग्रेजी में दो लाइन कैसे बोला जाये ये न सिखाती थी | अब या तो हिंदी में बोलिये या रोड पे घोडा अडकाइये| कुछ लोग और “डॉक्टर के आने के पहले रोगी मर चुका था” भी सीखा गए| अब तो फिर किसी का खून करिये और डॉक्टर बुलाईये, फिर ज्ञान आजमाइए| खैर हमने हिंदी बोलना ही उचित समझा, लेकिन बाकियों ने बहुत घोड़े अडकाये थे, आखिर आरा बिहार अश्वारोही पुलिस(Cavalry) का मुख्यालय जो था | अब समझ में आता है गलती के पी ठाकुर साहब के किताब की न थी हमें ही बीजगणित(algebra) के बीज(basics) से पहले कठिन गुणनखंड(Harder Factor; meaning advance concepts) सीखना था |

पता नही क्यों लोग दूसरों पर लेख लिख के अपनी जिंदगी का अर्थ निकालने कि नाकाम कोशिश करते रहते हैं , अगर करना ही है तो एक बार १०-१५ लाइन का लेख अपने ऊपर लिखिए या कोशिश कीजिये , बहुत बड़े राज का पर्दाफाश होगा , शायद आप अपनी पेशा और जीवन ही न बदल दे , अगर न भी करें तो एक नया नजरिया मिलेगा अपने बारे में अपनी सोच के बारे में| कभी कोशिश जरुर कीजियेगा|

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

मस्जिद घर से दूर थी

मस्जिद घर से दूर थी और खुदा था पास,
और वो समझे काफिरो के जमात से हम आये थे|
आशाओ का दीप ना जला पाया क्योंकि वहां हवा थी तेज,
उनको लगा हमें अँधेरे की आदत सी पड़ गयी थी|
बहुत आशाओ से उन्होंने हमें देखा,
पर वो समझ ही न पाये कि उनकी निराशा अब हमारी थी|
रात भर उनको सोच, हमें नींद ही नही आई,
उन्होंने तो हमें दिनभर सिर्फ उंघते ही देखा था|

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

एक कहानी ये भी

बचपन से मैं बड़ा आवारा किस्म का शरीफ हुआ करता था | आपको ताजुब हो रहा होगा इस विरोधाभाष के कारण, लीजिए अभी दूर कर देते हैं ,... विद्यालय अनुशाषण के लिए मशहूर था, अनुशाषण में रहना शायद मेरी मज़बूरी ही थी क्योंकि अनुशाषण बहाल करने वाले थे प्राचार्य थे मेरे पडोसी , जाने क्या सोच बाबु जी ने प्लाट ख़रीदा था, जाहिर है कभी अनुशा
षण तोड़ने का स्वप्न देखना भी पाप था, बस एक यही विद्याथियों वाले लक्षण थे मुझमे, दूसरा कारण था अपने उम्र से आगे के क्लास में नामांकन, अगर कुछ करना भी चाहो तो अपने से बलशाली सहपाठियो के शरीर कों देख शरीफ बनाने के अलावा और कोई विकल्प था भी नही, मज़बूरी का नाम मनमोहन | कभी कभी सोचता हूं अगर Malcolm Gladwell ने Outliers तब तक लिख दी होती और अगर काश मेरे घर में किसी ने Outliers पढ़ ली होती तो जन्म दिवस और जन्म वर्ष देख के मेरा नामांकन कराया होता , नामांकन वर्ष देख के जन्म वर्ष नही लिखा जाता|

बाकि पढाई लिखाई और मैं एक दूसरे कों बहुत इजात करते थे और एक दूसरे से मीलो दूर रहते थे , शिक्षकों में हारा बाजी लगती थी अगर ये मैट्रिक (१०) पास हो गया तो बिहार की शिक्षा प्रणाली का भगवान ही मालिक है, जो उस समय तक कुछ हद तक सच भी था , भगवान के पास एक अतिरिक्त प्रभार बिहार के शिक्षा मंत्रालय का भी था |

खैर शिक्षकों के दावों कि थोड़ी सचाई मेरी लतिरी(लेफ्ट) हाथ से लिखे जाने ब्रह्मा लिपि में छुपी हुई थी , जिसे पड़ने कि काबिलियत तब तक मैंने भी नही पाई थी, जो थोड़े उदार किस्म के थे वो बोल देते डॉक्टर बन सकता है , बहुत बाद में समझ आया की इस भविष्यवाणी का सम्बन्ध मेरे प्रतिभा और मेधा से ज्यादा मेरी लेखनी से है |

खैर सचिन तेंदुलकर से पीटे हुए गेंदबाज़ के तरह मैं भी अपनी लेखनी को विधि का विधान ही समझता रहा और शायद आज भी समझता हूं, फर्क सिर्फ इतना है की मैंने विषय सिर्फ वैसे चुने जिसमे वाक्य कम लिखने पड़े तो विज्ञान ले लिया | बचपन से अगर थोडा बहुत किसी चीज़ का शौक रहा तो वो शतरंज और गणित का था , वैसे तो दोनों मेरी समझ से बाहर के ही थे लेकिन मैं भी अपनी परिकल्पना के सीमाए बढाते रहता था , और कुछ था भी नही करने कों|

तो जब गणित से हिसाब करना सीख गया तो ६४ का आंकड़े ने बड़ा प्रभावित किया , ये था भी वर्ग ८x८ का शतरंज के ३२ मोहरों के लिए ६४ घर. पहली बार प्रबंधन सिखने का मौका मिला (आज तक उसकी का खा रहा हूं) , समझ में आया के हर मोहरे के लिए २ घर थे , खैर जब ये खेल बनाया गया था, तब घर कि समस्या इतनी विकट नही रही होगी इसलिए
६४ घर में सिर्फ ३२ मोहरों का खेल बना दिया|

लेकिन राजनीती और कूटनीति तो चाणक्य के समय से चली आ रही है, तो खेल बनने वाले ने हर तरह कि तिकडमबाजी करने वाले लोगो के सोच का समावेश मोहरों के चाल से किया और उसकी प्रवृति का विश्लेषण मोहरों के नाम में .... बड़ा सीखा शतरंज से जीवन कों सिर्फ शह मात देना छोड़ के , खैर इतना सोचने के चक्कर में कितने किताबे के पन्ने भी नही उलटे, वो तो भला हो बड़े भाइयों का जिनके पुरानी किताबे मुझे मिलते थी और मेरी किताब ना छूने की गलती छुप जाती थी जैसे रेलवे की चादर वापस देते समय देख कर मालूम नही पड़ता की आपने इस्तेमाल किया है या नही|

खैर ये समझ में तो आ चूका था की ना आज कल शिक्षा प्रणाली में लकीर के फ़कीर ना बन के ना पड़ने वालो के पास बहुत समय होता है सीखने का| जीवन में सबसे पहले वर्ग का तर्क ही समझ में आया था , १,४,९,१६,२५,३६,४९,६४,८१,१०० अब मेरे लिए आम हो चुके थे| हम १२x१२=१४४ तक पहुच चूका था , मुझे लगा शायद कोई खेल ये भी होगा और कुछ यहाँ भी सीखे| तब तक यथार्थ के समान्तर कहानी में बथानी टोला और बाथे की होली भी खेल चुकी थी, और धारा १४४ का एक नया आयाम समझने की बुद्धि भी धीरे धीरे आने लगी थी| खैर धारा की भौतिकी तो कभी समझ में ना आई , सिर्फ इतना समझ में आया की धारा वाले जिन्दा तार कों ना छू के ही जिन्दा रहा जा सकता है

मैं भारत के उस हिस्से में जन्मा था जहां लोगो ने १९८० के बाद से जाति को उपनाम से तो हटा दिया था, लेकिन अपने जहन में प्राथमिक स्थान दे दिया था | कइयो से मिला जिनके लिए मानवता जातिवादिता से क्षीण था , खैर ऐसे पड़े लिखे लोगो से मिलने के बाद तभी कि शिक्षा प्रणाली का असर मुझे खुद से भी ज्यादा बड़ा असफल प्रतीत होने लगा था|

तभी मुझे किसी ने भौतिक शास्त्र में Einstein बाबा की Theory of relativity के बारे में बताया | भौतिकी समझ से परे था वर्ग से इसका कुछ लेना देना नही था, अपनी लेखनी के तुलना किसी और से करके खुद कों और छोटा बनाना मैंने उचित नही समझा , ले दे के एक गणित बचा था , बस अंको कि तुलना करने बैठ गया , तो समझ में आया की लोकतंत्र में जनता का पसंदीदा उमीदवार वही होता है , जिसे जानते सबसे कम नापसंद करती है, कहीं समान्तर कहानी में लालू का प्रकोप से सब परेशान थे ही , relativity से मिलता जुलता शब्द Equity होता है जिसका अर्थ था समता | विद्यालय में सीखा था दुनिया में सबसे बड़ा पराक्रम अभियंता बनाना है और IIT का हो तो करेला नीम पे चड़ा (शायद सोने पे सुहागा में वो मजा नही है) , खैर मालूम पड़ा सुशाषण बाबु अभियंता है और समता पार्टी बनी है लालू के विकल्प के रूप में, फिर क्या था हम भी बन गए समर्थक सुशाषण बाबु के | Theory of relativity के ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दीये थे पुरे राज्य के खुलने में अभी भी कुछ वर्ष शेष थे |

तब तक तक़दीर मुझे कही और ले गयी , उसकी चर्चा कभी और करंगे |

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

Kya chahiye hame

हम हैं नए भारतीय, बाते करते है पुरानी
ना खोज कुछ नया तो सुनाये आर्यभट की कहानी
बाते करते सृजनता की, एक प्रश्न अगर अटपटा आये तो
देते है धरनाये कॉलेज में, जैसे सिलेबस ही थी हमारी जिंदगानी

जब जवान बनना था तो देश याद ना था,
अब बात बात पर अनशन की डूबे हमारी जवानी और जिंदगानी
भ्रष्टाचार मुक्त समाज चाहिए हमें जैसे बच्चे ढूंढे चाँद की  चांदनी
अगर मिल जाये तो क्या हम पचा पायंगे, कितना भी पीके पानी

शायद उत्तर सब जानते हैं लेकिन अब मूसलो से क्या डर,
जानते है दो चोरों में जो पीछे हटा है पहले वही चोर कहलायगा